३०-७-०९

हम एक राह के मुसाफिर है


कहीं अन्दर

बहुत अन्दर

खुद को तुझ में पाता हूँ

और तुम को खुद में

पर फिर भी जाने कौन सी

शीशे की दीवार है कहीं

कि न मैं तुम्हें छू पाता हूँ

और न तुम मुझे

हम एक ही राह के मुसाफिर है

पर एक राह के मुसाफिर

युगों-युगों से श्राप ग्रस्त है

कि वे एक दूसरे के साथ चलते हुए भी

एक दूसरे को नहीं पहचानते

क्योंकि उनकी नजरे एक दूसरे पर नहीं

दूर कही मंजिल पर होती है.

११-६-०९

इंतजार है उस चिड़िया का

वो नन्हीं चिड़िया भी अजीब थी
हमारे छोटे से घर के
छोटे से बरामदे के
एक कोने में बना रही थी
अपना
छोटा सा घोंसला

बरसात शुरू होने के
बिल्कुल पहले

हम हैरान होते
बिना किसी कैलेंडर के
चिड़िया को कैसे
लग जाती है खबर
मानसून के आमद की ?

सुबह की पहली किरण फूटने से
शाम ढ़ल जाने तक
चोंच में दबा दबा कर लाती थी
सूखी घास के अनगिन तिनके
जाने कहाँ कहाँ से
और कितनी कितनी दूर से

पत्नी सफाई करते
बड़ा ध्यान रखती थी उस घोंसले का
और तारीफ करती थकती न थी
चिड़िया के हौसले का

कहती थी –कैसे लगी रहती है
दिन भर अपने काम में
शायद पत्नी देखती थी चिड़िया में
अपना ही अक्श

पड़ोसी कहते थे रोज
घोसले को हटाने की बाबत
कहते थे चिड़िया है तो
चिड़िया की तरह रहे

बाहर या किसी पेड़ पर बनाये
अपना घोंसला


ये क्या बात हुई
आज बरामदे में है
कल ड्राइंग रूम में आ जायेगी

आखिर
किसी भी चीज की हद होती है

उन्हीं दिनों हम ढूँढ़ रहे थे
एक नया घर

हमारी हिम्मत नहीं होती थी
कि कुछ भी ऐसा करें

कुछ ही दिनों बाद
हमने अपने
नये घर में प्रवेश किया
और अलविदा कहना पडा उस चिड़िया को

परंतु आज भी
इंतजार है उस चिड़िया का
जिसने नया घर ढ़ूँढ़ने में
हमारी बेहद मदद की
और शायद दुआयें भी.

४-६-०९

प्रेम गली से गुजरो तो

एक अरसा बीत गया आप लोगों से मिले हुए. ये कहना भी कुछ सही नहीं है. बल्कि कहना चाहिए कि एक अरसा हो गया आप लोगों को मुझ से मिले हुए. आप लोगों से तो मैं मिलता ही रहता हूँ. एक मुक्तक से अभी अभी मुक्त हुआ हूँ तो इस बार वही आपके हवाले--

दिल को दिल तक जाने में एक जमाना लगता है

उन आँखों केअंदर मुझको एक मयखाना लगता है

कोई पागल , कोई मजनू , कोई दीवाना कहता है

प्रेम गली से जो गुजरो तो ये जुरमाना लगता है.

२-१-०८

तन किसमिस पर मन अंगूर

तकते हुए न कभी थकते है रूप बूढे रूप देख झुर्रियों पे रंग चढ जाता है,

तन किसमिस पर मन अंगूर बन पल में ही सातों आसमान चढ जाता है,

बूढो का न दोष कोई इसमे है रंचमात्र रूप देखके जो रूप पर मर जाता है,

सच तो ये है कि रूप सामने दिखाई दे तो मरे मुर्दे का हर्टबीट बढ जाता है.

२०-११-०७

त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी

ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत हो तो कई तो अक्सर ये सोंचते दिखते हैं कि समीर जी ने कोई बन्दा रखा हुआ है जो उनकी ओर से तुरत टिप्पणियाँ पोस्ट करता रहता है वर्ना सभी ब्लाग पर समीर जी की पहली टिप्पणी का जादू समझ के बाहर है. लोग समझ नहीं पाते हैं कि समीर जी अगर दिन रात ब्लाग पढते और टिप्पणियाँ ही करते रहते हैं तो वे बाकी काम कब करते होंगे.पर मेरा मानना है कि महान लोगों के काम करने का ढंग भी जुदा होता है. मुझे एक शेर याद आता है

कोई चार दिन की जिन्दगी मे सौ काम करता है
किसी की सौ बरस के जिन्दगी में कुछ नही होता.

मेरी समझ से यही समीर भाई का राज है.

बहरहाल मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों की बात करना चाह रहा था. कवि सम्मेलन मे कविता तो महत्वपूर्ण होती ही है. पर श्रोताओं का प्रतिसाद जिस एक चीज पर सबसे ज्यादा मिलती है वह है कवि या संचालक द्वारा कवि सम्मेलन के दौरान के गई त्वरित टिप्पणियाँ.
त्वरित टिप्पणियाँ देने में कई मंचीय हिन्दी कवियों का कोई जवाब नहीं है. वर्तमान में सत्य नारायण सत्तन ,
अशोक चक्रधर , सुभाष काबरा ,अरुण जैमिनी ,कुमार विश्वास, किरण जोशी , सुनील जोगी आदि हिन्दी मंच के उन विरल विभूतियों में से हैं जो घटित हो रही घटनाओं पर अपनी त्वरित टिप्पणियों से श्रोता समूह पर एक जादू सा करते हैं और उन्हें आह्लादित कर देते हैं। स्वर्गीय श्याम तो इसके मास्टर ब्लास्टर थे और टिप्पणियों की वो बारिश करते थे कि लोग गिनती ही नही सुध बुध सब भूल जाते थे.

एक बारमेरी शादी हुई
किसी कवि का एक जुमला जिसे देश के कई कवि ले उड़े वो है”’एक बार’ मेरी शादी हुई” इस जुमले में ‘एक बार’ का जवाब नहीं है. श्रोता बरबस पूछ बैठते हैं –एक बार? और कवि कहता है – जी हाँ आप लोगों की कृपा से अभी तक एक बार ही हुई है.

माइक वाले को एडवांस में पेमेंट
अकसर कवि सम्मेलन मे माइक सिस्टम खराब हो जाता है. ऐसी स्थिति मे एक जुमला लोगों को बहुत गुदगुदाता है. कवि कहता है- लगता है आयोजकों ने माइक वाले को एडवांस में पेमेंट कर दिया है. श्रोताओं क यह टिप्पणी अनायास ही गुदगुदा देती है.

माईक पर गणेश जी खड़े हैं
दिल्ली के अरुण जैमिनी ग्वालियर निवासी प्रदीप चौबे के स्थूल शरीर पर छींटाकसी करते हुए अकसर कहते हैं- ऐसा लग रहा है माएक पर गणेश जी खडे हैं और प्रदीप चौबे आनन फानन अरूण जमिनी को लक्षित करते हुए कहते हैं – बड़े माईक पर गणेश जी खड़े हैं और छोटी माइक पर उनकी सवारी मौजूद है. इस पर श्रोता अनायास खिलखिला उठता है.

कविता वोई और कवि कोई
कवि सम्मेलन की वर्तमान अराजकता पर जिसमें जिसको मौका मिले जिसकी भी कविता हो बिना नाम तक लिए कवि पढ देता है तालियाँ लूट कर ले जात है टिप्पणी करते हुए व्यक्तिगत बातचीत मे श्याम ज्वालामुखी कहा करते थे. पहले के जमाने मे कवि सम्मेलन में वोई कवि और वोई कविता हुआ करती थी और अब कविता वोई और कवि कोई.

बिहारी आदमी की ताकत
पिछले दिनों माँ सरस्वती की कृपा से एक ऐसी ही टिप्पणी मेरे मुँह से भी निकली. हुआ यों के दादर में एक कवि सम्मेलन था. युगराज जैन बतौर संचालक निमंत्रित थे. कवि गण थे- महेश दूबे, सुरेश मिश्रा, अनिल मिश्र, मोतीलाल श्रीवास्तव, शिखा पांडेय और मैं खुद. युगराज भाई ट्रैफिक में कहीं फंसे हुए थे और आयोजक कार्यक्रम शुरू करने को आमादा हो रहे थे. आखिरकार सुरेश मिश्र ने कार्यक्रम का संचालन शुरू किया और मोतीलालजी को काव्यपाठ के लिए खड़ा कर दिया. उनके काव्यपाठ के उपरांत मुझे खड़ा करने से पहले मेरे राज्य बिहार की काफी ‘तारीफ’ की और यहाँ तक कहा कि जो तालियाँ नहीं बजायेगा उस श्रोता का अगला जन्म भी बिहार में होगा. पर इसी बीच मूल संचालक युगराज जैन पधार चुके थे. सुरेश मिश्रा ने युगराज जी को मंच पर बुलाया और संचालन का भार उन्हे सौपते हुए खुद कवियों के बीच स्थापित हो गये. सामने श्रोताओं के बीच महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपा शंकर सिंह और वरिष्ट पत्रकार नन्द किशोर नौटियाल भी मौजूद थे. मैं माईक पर आया और पहला ही वाक्य मेरी कंढ से फूटा- आपको बिहारी आदमी की ताकत का अन्दाजा इसी से हो गया होगा कि उसके आने से पहले ही आदमी अपनी गद्दी छोड कर दूसरे को सौंप देता है. श्रोताओं की वह हंसी और उनके हाथ की वो तालियाँ .अहा हा क्या बताउँ ? मैं देर तक उस नशे मे रहा.

२-११-०७

रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो. फिर जब तुम्हे खबर देंगे तो वहाँ जाकर ज्वायन कर लेना . पर धीरे - धीरेलोगो को पता लग गया कि फलाँ फार्म भरकर ढिकाँ जगह जमा कर देने भर से कुछ होना जाना नही है तो लोगो ने उस मन्दिर की राह जाकर सिर पटकना बन्द कर दिया.


बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं


देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.


वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.


गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.


वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.


अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.


जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.

१६-१०-०७

किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का


पत्नी बोली- तुम क्या कमाते हो

असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है

उसके बीवी रोज

एक किलो प्याज खरीदती है

और सारा परिवार खाता है

तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ

तो आंखें लाल पीली होने लगती है

और प्याज के नाम पर

पतलून ढीली होने लगती है.

मैने कहा- फिजूल के खर्चे मत किया कर

और प्याज के ज्यादा चर्चे मत किया कर

ये चीज ही ऐसी धांसू है

कि पहले तो खाते वक्त आती थी

अब भाव सुन कर ही आंखों में आंसू है

क्या बताउँ दफ्तर मे चपरासी तक

बास के साथ लंच खाता है

क्योंकि अपनी टिफिन से निकाल कर

प्याज तो वही खिलाता है

अब तो लगता है

दूल्हा दहेज मे प्याज ही मांगेगा

और गले में नोटों की जगह

प्याज की माला टांगेगा

लडकी का पिता लडके के आगे

सिर के पगडी के बजाय

प्याज ही रखेगा

और मेरी लाज रख लीजिए के बजाय कहेगा

जी मेरा प्याज रख लीजिए

सास बहू को ताना मारेगी

अरे वो तो किस्मत ही खराब थी

जो यहाँ पे रिश्ता किया

वर्ना हमने तो अच्छे अच्छे प्याज वाले को

घर मे घुसने तक नही दिया

बडे बडे नेता खुद को

सिक्कों के बजाय प्याज से तुलवायेंगे

और अच्छे अच्छे कवि

प्याज पर कवितायें सुनायेंगे.

राजनीतिक पार्टियाँ अपना चुनाव चिह्न

प्याज रखेगी

और घर घर जाकर

प्याज बांटने वाली पार्टी ही

सत्ता का स्वाद चखेगी.

क्योकि प्याज की मारी जनता कहेगी

न हमे राम राज चाहिए

न कृष्ण राज चाहिए

हमे तो सिर्फ सस्ता प्याज चाहिए.

६-१०-०७

ये है मुंबई मेरी जान : जाने पहचाने अनजाने लोग

सो‍चता हूं और सं‍भव है कि शीर्षक पढ कर आप भी सों‍चने लगे़‍ कि जो जाने पहचाने हैं वे अनजाने कैसे हो सकते हैं‍. और जो अनजाने है वो जाने पहचाने कैसे हो सकते हैं. कबीर की उलटवांसी जैसी लगती है न? पर मुम्बई शहर ही उलटवासियो‍ का है.
सुबह सुबह उठता हूं. प्रातः भ्रमण के लिए निकलता हूं तो सबसे पहले बिल्डि‍न्ग के वाचमैन दिख जाते हैं . कोई लोगो की कार धुलाई कर रहा होता है तो कोई मोटर से पानी चढा रहा होता है. इन्हे पह्चानता हूं पर इनके बारे मे कुछ जानता नही हूं. ये कहाँ से आये हैं , कहाँ रहते हैं . कैसे खाते पीते हैं, कैसे जीते हैं. कुछ भी तो नहीं जानता. बाहर निकलते ही सडक पर एक आदमी दिखता है. कुत्तों को बिस्किट खिला रहा होता है. कुत्तों को भी पहचानता हूँ और बिस्किट खिलाने वाले सज्जन को भी. पर उन्हें जानता नहीं हूँ. एक लडकी हाथ में मिनरल वाटर की बोतल लिए दौडती रहती है. शायद किसी मैराथन में भाग लेना हो. पर उसे भी नही जानता. सुबह दफतर के लिए निकलता हूँ तो प्लेटफार्म पर कितने लडके और लडकियाँ दिखते हैं . एक दूसरे का इंतजार करते , गपियाते, बतियाते. किनका किनसे कौन सा रिश्ता है ये पता है . उन्हे घूरते बूढों को भी पहचानता हूँ . ये भी पता है कि इन भूतपूर्व जवानों के भी घूरने के अपने जोडे फिक्स हैं. पर इनमे से किसी को भी मैं कहाँ जानता हूँ. यही हाल दफ्तर और दफ्तर के बाहर है. सैकडों लोगों को पहचानता हूँ कि ये हमारे दफ्तर में है. पान की दुकान पर निश्चित समय पर आकर पान खाने वाले उस भाई को पहचानता हूँ. आंख बन्द कर पूरी शिद्दत से सिगरेट पीने वाली लडकी को भी पहचानता हूँ ,पर इनमे से किसी को भी कहाँ जानता हूँ? न ही जानने की कोशिश करता हूँ. और ब्लाग की दुनिया के कितने ही लोग हैं जिन्हें अच्छी तरह जानता हूँ पर उन्हे पहचानता नही हूँ. है न ये अजीब बात? पर इसी को कहते हैं कि ये है मुम्बई मेरी जान!

२४-९-०७

कविता पर क्रिकेट भारी है


ये वो है जो रिमोट पर कब्जा कर लेती हैं


दफ्तर से देवमणि पांडेय के साथ लौटते हुए चर्चगेट मे विनय पत्रिका वाले बोधिसत्व से मुलाकात हो गयी. उन्होने शिकायत की और कहा कि मेरा ब्लाग अच्छा है पर मै नियमित क्यो नही लिख रहा हूँ? मैने कहा कि कोशिश करूंगा.. फिर उन्होने बताया कि मुंबई मे हिन्दी के कुल जमा बारह ब्लागर है.पता नही बारह को वे जानते हैं या सचमुच सिर्फ बारह ही है. मै चाहूंगा कि बोधिसत्व बारह मुंबईया ब्लागरों की सूची मुझे और अन्य लोगो को भी उपलब्ध कराये.फिर उन्होने बताया कि पिछले दिनो मुंबई मे एक गुप्त ब्लागर मीट हुई जिसमे मुझे उन्होने इस लिए नही बुलाया क्योकि क्रिकेट मे ग्यारह खिलाडी ही होते है. मैने कहा चलिए ब्लागर मीट के बारे मे कुछ बाते कर ले तो बोले - अभी घर जाकर भारत पाकिस्तान का मैच देखूंगा. परिवार के साथ रहो तो बच्चों को भी अच्छा लगता है. इससे परिवार के प्रति उनके स्नेह का पता चला . अब ये निर्णय तो मै नही कर पाया कि परिवार के प्रति उनका स्नेह ज्यादा है या क्रिकेट के प्रति जूनून. पर यह ज्यादा अच्छा लगा कि हिन्दी के कवि लेखक जहाँ कविता कहानी के अलावा दुनिया मे किसी अन्य चीज का अस्तित्व ही नही मानते वही बोधिसत्व क्रिकेट जैसी चीजों मे भी अति रूचि रखते हैं उन्होंने वही सबवे के पास देवमणि को सहयाद्री रेस्तराँ मे चाय पिलाने का आदेश दिया और साथ मे कुछ खिलाने का भी. एक पंडित दूसरे पंडित से भोज कराने को कह रहा था और दोनो एक दूसरे की जेब हल्का करने को आमादा थे. बाद मे बोधि ने स्पष्ट किया कि अंधेरी से चर्चगेट के बेच मिलने पर चाय पानी का खर्चा देवमणि को उठाना है और अंधेरी से विरार के बीच बोधि खर्च उठायेंगे. उम्मीद है देवमणि आने वले समय मे अंधेरी की काफी यात्रायें करेंगे. मै तो सलाह दूंगा कि वे सीजन टिकट ही निकाल ले वर्ना उनका मामला भारत सरकार की तरह हमेशा घाटे मे रहेगा. बहरहाल घर आया तो पत्नी टी वी खोले क्रिकेट मे रमी हुई थी. वह क्रिकेट मैच के दौरान हमेशा रिमोट पर कब्जा कर लेती है. चाहे किसी मुशायरे या कवि सम्मेलन का प्रसारण किसी चैनल पे क्यो नही हो रहा हो. मै हमेशा तर्क देता हूँ कि मै कवि हूँ और इस हिसाब से अगर मुशायरे वगैरह का कार्यक्रम हो तो उस वक्त टी वी पर मेरा हक होना चाहिए क्योकि वह कोई क्रिकेटर होती तो जरूर उसे क्रिकेट देखने का हक होता. इस पर पत्नी बोलती है - दूसरों की शारती सुनने से मेरे लेखन पर दूसरों का प्रभाव पडने का खतरा है. इसलिए कविता पर हमेशा क्रिकेट भारी पडता है. फिर इस बार सीधे शाहरूख खान स्टेडियम मे अपने बेटे के साथ मौजूद थे और हर मौके पर तालियाँ बजा कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे. पत्नी बोली - क्या कभी शाहरूख खान आपकी कविता सुनने आयेगा और अगर आ भी गया तो तालियाँ बजायेगा. मैने कहा आमिर खान ने जब किरण राव से शादी रचाई तो पंचगनी मे कवियों को बुलाया था. अच्छा पेमेंट किया था और काव्यानंद लिया था. पर पत्नी ने आमिर खान को सिरे से खारिज कर दिया कि जो आदमी अपनी पहली बीवी को बाय बाय कर दूसरी के साथ गुलछर्रे उडा रहा है उसकी तो बात ही क्या करनी. आदमी है तो शाहरूख . कभी किसी की ओर देखता तक नही. अब मेरी एक ही इच्छा है कि एक ऐसा कवि सम्मेलन हो जिसमे शाहरूख खान बतौर श्रोता आये और मेरी कवितायें सुन कर तालियाँ बजायें . खैर जब इंडिया ने आखिरी छक्का लगाया उससे पहले उसने डर के मारे टी वी ही बन्द कर दिया. मैने पूछा टी वी क्यो बन्द कर दिया. पत्नी बोली - मुझे लगा इंडिया शायद हार न जाये. मेरी तो जान ही निकल जाती. खैर इंडिया टीम को बहुत बहुत धन्यवाद . उसने मुझे विधुर होने से बचा लिया.


१६-९-०७

एक सपनो का महल हो गर्ल्स होस्टल के सीधे सामने

खिड़कियां

मेहरा साहब उस दिन विमान मे बैठे बैठे किसी फिल्मी पत्रिका मे एक अभिनेता के सपनों के घर के बारे मे पढकर चौंक गये थे. चौंकना स्वाभाविक था, क्योकि वह अपने सपनों का महल किसी सुरम्य वादी या स्वर्ग मे नही बसाना चाहता था. वह तो बस इतना चाहता था कि उसका घर लडकियों के किसी कालेज के होस्टल के सामने हो और उसी मे वह अपनी पूरी जिन्दगी हंसी खुशी गुजार दे.

तब उन्हे ख्याल आया था कि उनका स्वयं का घर भी तो एक ऐसे ही रमणीय स्थल पर है. दिन भर सामने से एक पर एक छप्पन छूरी लोगों के दिलों मे बहत्तर पेंच पैदा करती गुजरती रहती है. फिर दूसरी मंजिल के सबसे पश्चिम वाले कमरे की खिडकी तो होस्टल के शयन कक्ष के ठीक सामने खुलती है.अगर शयन कक्ष की खिडकियाँ भी खुली हो तब तो क्या क्या देखने को नही मिलता है. और हाय! गर्मियों मे तो मेहरा साहब कई कई रातें जागकर गुजार किया करते थे. लडकियाँ ठंडी हवा के लिए खिडकी खुली छोड कर सोती थी और भूले से अगर परदा भी नही खिंचा होता तो रात को उनके शरारती कपडे कहाँ कहाँ से फिसल जाते कि तौबा तौबा.

वैसे मेहरा साहब तो समय के साथ साथ बूढे होते चले गये, पर लडकियाँ कभी बूढी नही हुई. हर साल नई-नई और खूबसूरत लडकियाँ आ जाती. उनके जमाने मे तो इतनी लाजवाब लडकियाँ होती भी नही थी, खैर..... अब तो सदा व्यापार के सिलसिले मे बाहर रहना होता है , तो भला ऐसे मौके कहाँ? लेकिन अचानक उन्हे अपने दोनों बेटों की याद आई, वे? वे तो.........?

वे उसी शाम उस कमरे मे गये. शयन कक्ष की खिडकियाँ पूर्ववत खुली थी. उन्होने गौर से देखा, कोई लडकी अपने कपडे बदल रही थी. उन्होने शर्म से आंखे बन्द कर ली.

उसी क्षण उन्होने यह भी निश्चय कर लिया कि उन्हे छात्रावास के वार्डन से मिलना चाहिए.

दूसरी ही सुबह पहुंच भी गये और कहने लगे,समझ मे नही आता आपके यहाँ की लडकियाँ कितनी बेशरम है? अन्धे तक को भी दिखाई पडता है कि पहाड जैसा मकान सामने खडा है , फिर भी कमरे की खिडकियाँ होले यो कपडे बदलती रहती है कि...........बेशरम.

युवा वार्डन घडी भर को चुप रही. फिर बोली, अरे, मेहरा साहब, लडकियाँ तो लडकियाँ ! नादान है, भोली है, यों तो परदे खींच ही देती होंगी, पर उम्र ही ऐसी है कि दुपट्टा भी सम्भाले नही सम्भलता है. फिर खिडकी तो खिडकी है. और फिर अगर आपको इनकी शर्म का इतना ख्याल है तो आप अपनी खिडकी बन्द करके भी तो उन्हे बेशरम होने से बचा सकते हैं

मेहरा साहब के पास अब कोई जवाब नही था.